क्र. 2
शीत का मौन
हिमपात के बाद की नीरवता
- माध्यम
- कैनवास पर तैलचित्र
- आयाम
- 60 × 76 cm
- वर्ष
- 2025
घने शीत में एक खुला वन-मैदान, उस क्षणभंगुर घड़ी में पकड़ा हुआ जब ढलता सूरज आकाश को ऊष्मा से भर देता है और नीचे की धरती जमी रहती है। केंद्र से ज़रा दाहिनी ओर एक ऊँचा देवदार खड़ा है, उसकी शाखाएँ भारी बर्फ़ से झुकी हुईं, मौन का पहरा देता एक प्रहरी। बाईं ओर से एक पाला-जड़ा भूर्ज चौखट में झुक आता है, उसकी डालियाँ बर्फ़ीले नीले-श्वेत तंतुओं में दोनों के बीच खुले आकाश की ओर झरती हैं।
रंग-योजना ठंडे को गरम के आमने-सामने रखती है। हिमनद जैसी सफ़ेदियाँ, हल्के नीले और बैंगनी की फुसफुसाहटें धरती को थामे हैं, और उनके ऊपर आकाश आड़ू, ख़ुबानी, सोना और धुएँदार गुलाबी उँडेल देता है। वह गरम रोशनी जगह-जगह बर्फ़ के ढेरों को छू जाती है, उन्हें हल्की अम्बरी रंगत देती हुई, जिससे आकाश और धरती पूरे कैनवास पर मानो आपस में संवाद करते लगते हैं।
पदचिह्नों की एक अकेली पंक्ति अनछुई बर्फ़ में मुड़ती हुई जाती है और क्षितिज पर फ़ीरोज़ी रोशनी की एक झलक की ओर ओझल हो जाती है। मानव उपस्थिति का यही एकमात्र चिह्न है, और वह भी विदा लेता हुआ। बर्फ़ स्वयं गाढ़े, मूर्तिशिल्प जैसे लेपों में रची गई है जो चित्र की सतह पर असली रोशनी पकड़ते हैं; पास खड़े होइए तो कैनवास शीत ऋतु का एक उभरा हुआ मानचित्र बन जाता है।
भाव है थमी हुई निस्तब्धता: ठंडी हवा, बुझती रोशनी, और ताज़ा हिमपात के बाद की दबी हुई चुप्पी, जिसमें उन दूर जाते क़दमों की कोमल उदासी घुली है।
तूलिका का काम
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