कलाकार
दो अक्षर,
देखने में बीता एक जीवन।
इस संग्रह का हर कैनवास दो शांत अक्षरों से हस्ताक्षरित है: DH। इनके पीछे एक चित्रकार हैं जिन्होंने देखने में पूरा जीवन बिताया है। समुद्र को, जो दिन की आख़िरी धूप लौटा रहा है। देवदार की शाखाओं पर ठहरती बर्फ़ को। खिड़की की रोशनी को, जो उसी सुबह तोड़े गए फूलों पर तिरछी गिरती है।
वे तेल रंगों में चित्र बनाती हैं, और रंग गाढ़ा लगाती हैं। पंखुड़ियाँ रंग से लबालब तूलिका के मोटे स्पर्शों से बनती हैं; बर्फ़ कैनवास से मूर्तिशिल्प जैसी मुड़ेरों में उभर आती है; मुर्गे की कलगी गीली, लाल और बेझिझक रखी जाती है। पास आइए तो विषय घुलकर शुद्ध, भौतिक रंग बन जाता है। पीछे हटिए तो संसार फिर जुड़ जाता है, पहले से अधिक ऊष्मा लिए।
उनके विषय जान-बूझकर साधारण हैं: एक हंसिनी, टीलों के बीच से जाती एक पगडंडी, लेस की पट्टी पर रखे सेब। हर कृति यहाँ उसी तरह प्रस्तुत है जैसे संग्रहालय अपने ख़ज़ाने प्रस्तुत करते हैं: अकेली, अपनी रोशनी में, अपनी कहानी के साथ।
यह साइट उनकी स्थायी प्रदर्शनी है। इसके द्वार कभी बंद नहीं होते।